Practice of Brahmacharya – कब, क्यों और कैसे
Practice of Brahmacharya – कब, क्यों और कैसे
भारतीय सनातन संस्कृति में ब्रह्मचर्य केवल एक नियम नहीं, बल्कि जीवन को ऊँचाई देने वाली एक गहन साधना है। आज के भौतिक और भोगप्रधान युग में जहाँ इंद्रिय-सुख को ही जीवन का लक्ष्य माना जाने लगा है, वहीं ब्रह्मचर्य मनुष्य को आत्मबल, तेज, बुद्धि और चरित्र प्रदान करता है। यह केवल संन्यासियों या विद्यार्थियों तक सीमित नहीं है, बल्कि गृहस्थ, व्यवसायी और साधक—सभी के लिए उतना ही आवश्यक है।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं :

इस लेख में हम समझेंगे—
- ब्रह्मचर्य की परिभाषा
- कब ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए
- क्यों ब्रह्मचर्य आवश्यक है
- ब्रह्मचर्य का अभ्यास कैसे करें
- महापुरुषों के विचार और उद्धरण
- ब्रह्मचर्य के शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक लाभ]
ब्रह्मचर्य की परिभाषा
‘ब्रह्मचर्य’ दो शब्दों से बना है :
ब्रह्म + चर्य
अर्थात ब्रह्म में विचरण करना।
केवल वीर्य-संयम ही ब्रह्मचर्य नहीं है। मन, वाणी और कर्म—तीनों का संयम ही वास्तविक ब्रह्मचर्य है।
महर्षि पतंजलि (योगसूत्र) कहते हैं :

ब्रह्मचर्य का आदर्श काल – कब ?
1. विद्यार्थी जीवन (ब्रह्मचर्य आश्रम)
0 से 25 वर्ष की आयु को ब्रह्मचर्य के लिए सर्वोत्तम माना गया है। यह काल जीवन की नींव रखता है।
स्वामी विवेकानंद कहते हैं :

2. युवावस्था
युवावस्था में ब्रह्मचर्य शक्ति को सही दिशा देता है। यही शक्ति आगे चलकर सफलता बनती है।
3. गृहस्थ जीवन में संयम
गृहस्थ के लिए पूर्ण त्याग आवश्यक नहीं, परंतु मर्यादित और धर्मसम्मत संयम अनिवार्य है।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं :

ब्रह्मचर्य क्यों आवश्यक है ?
1. ऊर्जा संरक्षण के लिए
वीर्य शरीर की सबसे सूक्ष्म और शक्तिशाली ऊर्जा है। इसका दुरुपयोग जीवन को कमजोर करता है।
2. मानसिक स्थिरता के लिए
ब्रह्मचर्य से मन शांत, एकाग्र और विचार शुद्ध होते हैं।
3. आध्यात्मिक उन्नति के लिए
बिना ब्रह्मचर्य के ध्यान, भक्ति और साधना संभव नहीं।
श्री रामकृष्ण परमहंस कहते हैं :

4. रोगों से रक्षा
अतिविषय-भोग से कमजोरी, अवसाद, स्मृति-हानि और अनेक रोग उत्पन्न होते हैं।
ब्रह्मचर्य के लाभ
शारीरिक लाभ
- ओज और तेज में वृद्धि
- रोग प्रतिरोधक शक्ति मजबूत
- चेहरे पर कान्ति
- दीर्घायु
मानसिक लाभ
- एकाग्रता और स्मरण शक्ति तेज
- भय और चिंता में कमी
- आत्मविश्वास में वृद्धि
आध्यात्मिक लाभ
- इंद्रियों पर नियंत्रण
- ध्यान में गहराई
- भक्ति में रस
- आत्मसाक्षात्कार की संभावना
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं :

आदर्श ब्रह्मचारी महापुरुष
1. हनुमान जी
अखंड ब्रह्मचारी, अपार बल और भक्ति के प्रतीक।
2. भीष्म पितामह
प्रतिज्ञा के बल पर जीवन भर ब्रह्मचर्य का पालन।
3. स्वामी विवेकानंद
युवाओं को ब्रह्मचर्य का संदेश देने वाले महान संत।
4. शंकराचार्य
अल्पायु में अद्वैत वेदांत की स्थापना—ब्रह्मचर्य की शक्ति से।
ब्रह्मचर्य का अभ्यास कैसे करें ?
1. आहार शुद्धि
- सात्त्विक भोजन
- अधिक मसाले, मांस, नशा त्यागें
- अधिक भोजन न करें.
2. विचार शुद्धि
अश्लील साहित्य, वीडियो से दूरी
मन को सद्ग्रंथों में लगाएँ
3. दिनचर्या
- ब्रह्ममुहूर्त में उठना
- सूर्य नमस्कार, प्राणायाम
- नियमित अध्ययन
4. सत्संग
अच्छी संगति ब्रह्मचर्य को सहज बनाती है।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं :

5. नाम जप और भक्ति
राम नाम, कृष्ण नाम या गुरुमंत्र—मन को विषयों से हटाता है।
ब्रह्मचर्य और आधुनिक जीवन
आज यह माना जाता है कि ब्रह्मचर्य असंभव है, परंतु यह भ्रम है। सही दृष्टि और अभ्यास से यह संभव है।
स्वामी विवेकानंद कहते हैं :

ब्रह्मचर्य चरित्र की रीढ़ है।
भ्रम और सत्य
❌ ब्रह्मचर्य कमजोरी है
✔️ ब्रह्मचर्य परम शक्ति है
❌ ब्रह्मचर्य केवल संन्यासियों के लिए है
✔️ ब्रह्मचर्य हर मनुष्य के लिए है
❌ ब्रह्मचर्य अस्वाभाविक है
✔️ ब्रह्मचर्य मनुष्य का मूल स्वभाव है
ब्रह्मचर्य कोई कठोर नियम नहीं, बल्कि जीवन को दिव्य बनाने की कला है। यह मनुष्य को पशुता से उठाकर देवत्व की ओर ले जाता है। आज यदि युवा ब्रह्मचर्य को समझ लें, तो समाज स्वतः सशक्त हो जाएगा।
प्रेमानंद जी महाराज कहते हैं :

ब्रह्मचर्य अपनाइए :
शक्ति बढ़ाइए,
चरित्र बनाइए,
और जीवन को सार्थक बनाइए।
